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नालंदा से प्राचीन विश्वविधालय का अवशेष है अपसढ़, लेकिन….

अशोक प्रियदर्शी
बिहार के नवादा जिले के वारिसलीगंज प्रखंड के अपसढ़ गांव में नालंदा से भी प्राचीन विश्वविधालय के अवशेष मिल चुके हैं। लेकिन इसकी सुरक्षा भगवान भरोसे हैं। वैसे, मार्च 2011 में बिहार के कला संस्कृति विभाग ने 2.18 एकड़ गढ़, 74. 20 एकड़ तालाब और तीन डिसमील वराह मूर्ति के लिए भूमि को संरक्षित कर दिया है। लेकिन जमीन पर इस दिशा में कोई पहल नही किया जा सका है। लिहाजा, ऐतिहासिक महत्व के पुरातात्विक साक्ष्य का नुकसान हो रहा है।
गढ़ और तालाब का अतिक्रमण हो रहा है। वराह की मूर्ति क्षतिग्रस्त हो रहा है। गांव में सैकड़ों मूर्तियां बिखरी पड़ी है। मूर्तियों में मवेशी बांधे जा रहे हैं। दर्जनों कीमती मूर्तियां गायब कर दी गई है। यही नहीं, गढ़ की भीतियों में रामायण के प्रसंगों का आकर्षक चित्र था, जो संरक्षण के अभाव में नष्ट हो गया है। यही नहीं, सरकारी स्तर पर संरक्षित क्षेत्र को अतिक्रमण किया जा रहा है। अपसढ़ सरोवर के किनारे मनरेगा भवन, आंगनबाड़ी केन्द्र और शौचालय निर्माण करा दिए गए हैं। कई भूमिहीनों को संरक्षित क्षेत्र में जमीन का परचा दे दिया गया है। संरक्षित सरोवर पर मत्स्य विभाग का कब्जा है।
अपसढ़ विरासत समिति के संयोजक युगल किशोर सिंह ने कहा कि कई दफा जिला प्रशासन से इसकी शिकायत की गई है। कला संस्कृति और युवा विभाग के निदेशक अतुल कुमार वर्मा ने जिला प्रशासन को संरक्षित घोषित अपसढ़ को अतिक्रमण मुक्त करने का पत्र लिखा है। हालांकि जिलाधिकारी ललनजी के मुताबिक, अधिकारी को आवश्यक कार्रवाई के लिए निर्देश दिया जा चुका है। गौरतलब हो कि राज्य सरकार ने अपसढ़ के विकास के लिए एक करोड़ रूपए राशि का प्रावधान भी किया है। लेकिन इस दिशा में पहल नही किया जा सका है।

क्या है अपसढ़ का इतिहास
1970-80 के दशक में कला संस्कृति विभाग के तत्कालीन निदेशक डाॅ प्रकाश शरण प्रसाद के नेतृत्व में की गई खुदाई मंे नालंदा से प्राचीन यूनिवर्सिटी का अवशेष मिला था। इसे धार्मिक महाविहार का अवशेष करार दिया। शाहपुर में प्राप्त मूर्ति में ‘अग्रहार’ का जिक्र मिला था। डाॅ. प्रकाश के मुताबिक, ‘अग्रहार’ शब्द के मुताबिक यह तक्षशिला के समकालीन था। तक्षशिला का जिक्र भी अग्रहार के रूप में मिलता है। मेजर कीटो, कनिंघम, एएम ब्रोडले, बिहार डिस्ट्रिक्ट गजेटियर और एंटीक्यूरीयन रीमेंस इन बिहार में अपसढ़ की चर्चा है। वराह की मूर्ति है, जिसकी तुलना मध्यप्रदेश के एरन में स्थापित मूर्ति से की जाती है।

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