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ठंठ की चादर से ढ़की मेरी पहचान

डाॅ. अशोक प्रियदर्शी
बात एक साल पहले की है। दिसंबर का महीना था। मैसूर जा रहे थे। ठंड काफी थी। इसलिए पूरा शरीर गर्म कपड़े से ढका था। सिर पर भी टोपी थी। ऐसे में अचानक आइने में नजर पड़ी। एक पल के लिए अपना चेहरा भी भ्रमित दिख रहा था। इसी वेश में पटना जंक्शन से सफर की शुरूआत हुई। ट्रेन की रफ्तार के साथ ठंड का अहसास बढ़ता गया। इलाहाबाद पहुंचने के गरम कपड़े उतरने लगे। अगले दिन इटारसी स्टेशन पहुंचते पहुंचते ठंड का असर कम महसूस होने लगा। स्वेटर खुल गया। इसके अगले दिन विजयवाड़ा (आंध्रप्रदेश) पहुंचते ही इनर भी खोलना पड़ गया। रात्रि में बंगलोर पहुंचते ही ठंड काफूर हो गया। गरम कपड़े पूरी तरह से हट गया। शरीर पूरी तरह आजाद महसूस करने लगा। यानि मैं वाजिव स्वरूप में आ गया।
कुछ ऐसा ही अंतर उतर और दक्षिण भारत के पुरातत्व, धरोहर, पर्यटन और औधोगिक विकास को देखकर महसूस हुआ। बिहार के अधिकतर धरोहर और पर्यटन स्थल ठंड की चादर से ढ़का है। हालांकि ठंड की चादर तीन-चार माह में हट जाता है। परंतु उपेक्षा की चादर लंबे समय से पड़ी है। लिहाजा, बिहार वाजिब स्वरूप में नही निखर पाया है। देखें तो, कर्नाटक की भूमि अपेक्षाकृत उपजाउ नही है। लेकिन अपनी खूबसूरती के कारण कर्नाटक की राजधानी बंगलोर ‘उद्यानों का शहर’ और इलेक्ट्रोनिक क्रांति के कारण ‘इलेक्ट्राॅनिक शहर’ कहा जाता है।
यही नहीं, मैसूर पठारी और जंगली इलाका है। लेकिन औधोगिक विकास के कारण कर्नाटक का रत्न कहा जाता है। यहां कई बड़े औधोगिक इकाइयां हैं। मैसूर पैलेस, वृंदावन गार्डन जैसे अनगिनत जगह हैं, जो छोटा सा भूभाग में अवस्थित मैसूर की यादें साल भर बाद भी तरोताजा बनाए हुए हैं। मैसूर के पठारी रास्ते, संुदर बाग बगीचा आज भी अपनी ओर खींचता है। इसकी सैंडल सिटी आॅफ इंडिया के नाम से पहचान है।
यही नहीं, मैसूर की पहाडी पर अवस्थित चामुंडी मंदिर के अलावा टीपू सुल्तान का किला, श्रीरंगपटनम मंदिर जैसे कई चीजें है जो अपनी ओर खींचता है। श्रवणबेलगोला, हेलीबीडू और बेलूर जैसे दूर दराज स्थल लोगों को कर्नाटक से जोड़ता है। आंध्रप्रदेश के तिरूपति मंदिर, तामिलनाडु का उटी, मदुरैय, रामेश्वरम और कन्या कुमारी जैसे विकसित स्थान दक्षिण की ओर खींचता है। द्रविड़ शैली की मूर्तिकला देखने लायक है।
ऐसा नही कि बिहार में ऐसे स्थानों की कमी है। बिहार खासकर मगध का इतिहास गौरवशाली रहा है। पटना स्थित केपी जायसवाल शोध संस्थान के एक सर्वे के मुताबिक, बिहार में करीब साढ़े आठ हजार ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल हैं। देखें तो, राज्य के प्रत्येक पंचायत में कोई न कोई धरोहर है। लेकिन बिहार के नालंदा, राजगीर, बोधगया जैसे चुनिंदा क्षेत्र से ही लोग वाकिफ हैं।
बाकी स्थलों पर ठंड की चादर पड़ी है। लिहाजा, बिहार की वाजिब पहचान से लोग वंचित हैं। ककोलत जलप्रपात, बेगूसराय झील जैसे अनगिनत स्थल है, जिसे विकसित कर सैलानियों को आकर्षित किया जा सकता है। उटी के झील को विकसित कर पर्यटन स्थल बना दिया गया। लेकिन बिहार में पहाड़ियां है। नदियां हैं। सरोवर है। मंदिर हैं। लेकिन इतिहास के पन्ने तक सीमित हैं।
गौर करें तो मगध और दक्षिण से गहरा ताल्लुक रहा है। चंद्रगुप्त मौर्य मगध के राजा थे। 322 ईपू में सतासीन हुए थे। लेकिन उन्होंने अपनी मौत के लिए श्रवणबेलागोला का चुना था। 298 ईवी पूर्व में उपवास के बाद मौत हुई थी। यह आवश्यक नही कि सब जगह एक ही तरह का विकास दिखें। हर क्षेत्र की अपनी खुशबू है। विविधता में एकता ही देश की पहचान है। लेकिन यह जरूर संभव है कि धरोहरों पर पड़े ठंड की चादर को हटाया जाय ताकि बिहार की पहचान निखर सके। जाहिर तौर पर मगध का इतिहास ही भारत का इतिहास माना जाता रहा है। लेकिन यह इतिहास ठंड की चादर से ढ़का है।
मिसाल के तौर पर नालंदा के एंकगरसराय के तेल्हाड़ा गांव मंे एक टीला था। झाड़ियों से घिरे टीला के समीप लोग शौच किया करते थे। लेकिन इसकी जब खुदाई की गई तब तेल्हाड़ा का स्वरूप नालंदा से प्राचीन यूनिवर्सिटी के रूप में सामने आया। अपसढ़ और ओदंतपुरी यूनिवर्सिटी के अवशेष भी कुछ इसी तरह सामने आया। ऐसे स्थलों की फेहरिस्त लंबी है, जिसे विकसित कर मगध के इतिहास को पुनर्जीवित किया जा सकता है। ऐसे स्थलों के विकास से पर्यटकीय संभावनाएं विकसित होगी। रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। तब बिहारियों को बिहारी कहलाने में गौरव की बात होगी।
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