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बिहार की महिला हैंडबाॅल टीम की कप्तान की कहानी, खुशबू की जुबानी

अशोक प्रियदर्शी
तीन साल पहले की बात है। खुशबू बिहार महिला हैंडबाॅल की कप्तान थी। लेकिन खुशबू को उसके मम्मी पापा ने खेल मैदान जाने से रोक दिया। घर की चहारदीवारी में कैद कर दिया गया। खुशबू सात दिनों तक रोयी थी। खुशबू के मुताबिक, वह कई माह तक खेल मैदान नही गई। बड़ी मुश्किल से बंदिशों से आजादी मिली। वही खुशबू आज वियतनाम में 24 सितंबर से 3 अक्तूबर तक आयोजित पांचवीं एशियन बीच गेम्स की हिस्सा बनी है। 23 सितंबर को भारत से रवाना हुई है. पांच अक्टूबर को लौट रही है। खुशबू बिहार से अकेली खिलाड़ी है, जो इंडियन वुमेनस बीच हैंडबाॅल टीम की हिस्सा बनी है।
हालांकि पांच माह पहले हैंडबाॅल फेडरेशन की ओर से पाकिस्तान में आयोजित गेम के लिए भी खुशबू को भारतीय महिला टीम में शामिल किया गया था। लेकिन आखिरी दौर में वीजा देने की त्रृतिपूर्ण प्रक्रिया के कारण वह पाकिस्तान जाने से वंचित रह गई थी। लेकिन इसके पहले 2015 में बांगलादेश के चिटगांव, ढाका मेें आयोजित हैंडबाॅल प्रतियोगिता में खुशबू इंडियन टीम का हिस्सा थी। यही नहीं, फरवरी 2016 में पटना में भारतीय खेल प्राधिकार के तहत आयोजित राजीव गांधी खेल अभियान के नेशनल वुमेन स्पोर्टस चैम्पियनशिप में बिहार को जीत दिलाई।

बंदिशों से मुक्ति के बाद मिली कामयाबी
बिहार के नवादा जिले के पटेलनगर की खुशबू की कामयाबी घर की बंदिशों से आजादी के बाद मिली है। दरअसल, तीन पीढ़ियों के बाद अनिल सिंह की दो बेटियां खुशबू और सोनी थी। खुशबू के दादा को मंजूर नही था कि लड़कियां खेल मैदान में जाएं। लड़कों के साथ खेलें। दूसरे जगह खेलने जाय। हालांकि दादा की जानकारी के बगैर खुशबू को उसके मम्मी पापा खेल मैदान भेजा करते थे। लेकिन खुशबू की उपलब्धियां जब छपा करती थी तब दादा एतराज किया करते थे।
खुशबू के मम्मी पापा बताते हैं कि घर के बाहर भी पास पड़ोस के लोग भी तरह तरह के उलाहना से उनसबों को जीना मुहाल कर दिया था। आर्थिक तंगी के बावजूद खुशबू को खेलने के लिए भेजा करते थे। फिर भी सामाजिक उलाहना के कारण खुशबू को खेल मैदान जाने से रोका गया था। लेकिन फिर खुशबू ने भरोसा दिलाई कि अपनी उपलब्धियों से सबका मुंह बंद कर दूंगी। यह सच साबित हुआ। उसने मेडलों से धर भर दिया। बोलनेवालों की जुबां पर ताला लग गया।
खुशबू की उपलब्धियों से उसके मम्मी पापा बेहद खुश हैं। मम्मी प्रभा देवी और पापा प्रभा देवी कहते हैं कि किस माता पिता को बेटी की खुशी अच्छा नही लगता। लेकिन समाज बेटियों के बारे में धारणा ठीक नही रखती। इसके चलते गरीब परिवार की बेटियों को आगे बढ़ने में ऐसी परेशानियां आती है। दरअसल, खुशबू का पैतृक गांव नारदीगंज प्रखंड का परमा है। बच्चों के परवरिश के लिए नवादा शहर में रहते हैं। आटा चक्की मील चलाकर परिवार का परवरिश करते हैं। खुशबू कहती हैं कि मम्मी पापा के दबाव के बाद आगे बढ़ने की लालसा बढ़ गई। उसका नतीजा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भाग लेने का अवसर मिलने लगा।

शानदार रहा है खुशबू का प्रदर्शन
देखें तो, खुशबू को खेलने से तब रोक दिया गया था जब वह राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी थी। बिहार के खेलों में लगातार 2014 तक नवादा को गोल्ड मेडल मिला है। यही नहीं, 2008 से लगातार हैंडबाॅल वुमेन टीम की कैप्टन है। खुशबू को लगातार बेस्ट खिलाड़ी का अॅवार्ड मिलता रहा है। खुशबू अपनी मेहनत से मेडलों और प्रशस्ति पत्र का अंबार लगा दी है। खुशबू का चयन भी जिला पुलिस बल में हो गया है।
खुशबू की बहन सोनी बीएसएफ मेें हेड कंास्टेबल है। भाई दीपक गे्रजुएशन कर रहा है। देखें तो, खुशबू को इस हैंडबाॅल खेल में आन की कहानी दिलचस्प है। 2008 में नवादा में 54वीं नेशनल स्कूल गेम आयोजित हो रहा था। हैंडबाॅल का गल्र्स टीम नही थी। तभी नवादा प्रोजेक्ट स्कूल के आठवीं की छात्रा खुशबू का चयन हैंडबाॅल खिलाड़ी के रूप में किया गया था। खुशबू के नेतृत्व में बिहार टीम जीती। उसके बाद से खुशबू हैंडबाॅल में जुड़ गई। तब से खुशबू का शानदार प्रदर्शन रहा है।

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