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लावारिस मरीजों का वारिस बनकर पांच साल से सेवा कर रहे हैं जगदीश

डाॅ अशोक प्रियदर्शी
करीब छह माह पहले की बात है। मानव तस्करों ने लखीसराय से पांच साल के एक बच्चे को गायब कर दिया था। उसे नवादा के गारोविगहा हाल्ट के समीप बच्चे की हत्या कर अंग निकालने की कोशिश कर रहा था। लेकिन बच्चे की शोर के कारण पब्लिक आ गए। लिहाजा, अंग तस्कर बच्चे को धायल अवस्था में छोड़कर भाग गया। घायल बच्चे को सदर अस्पताल में दाखिल कराया गया। होश आने के बाद बच्चे सिर्फ अपने नाम के सिवा मम्मी का नाम बता रहा था। लिहाजा, लावारिस के बतौर भर्ती था। तब अस्पताल में भर्ती 70 वर्षीय जगदीश गोप अभिभावक की भूमिका निभा रहे थे। जगदीश उस बच्चे के खान पान और दवा आदि का पूरा ख्याल रखते थे। जगदीश को अस्पताल से जो दूध मिलता था, वे उस बच्चे को पिला देते थे। जगदीश के मुताबिक, बच्चे ठीक से खाना नही खा पाता था। इसलिए उसे दूध पिला दिया करते थे। दस दिन बाद उसके परिजन पहुंचे। तब वे लोग बच्चे को ले गए।
लावारिश मरीजों के साथ जगदीश के लगाव की कहानी पहला नही है। वे पिछले पांच सालों सेलावारिश मरीजों के लिए अभिभावक की भूमिका में खड़े दिखते हैं। दो माह पहले भी एक ऐसी ही घटना घटी थी। बेटे के लिए नास्ता लेकर वारिसलीगंज से एक महिला नवादा आ रही थी। लेकिन रेलवे क्राॅसिंग के समीप दुर्घटनाग्रस्त हो गई। बेसुध हालत में रिक्शा चालक ने अस्पताल पहुंचा दिया था। होश में आई तब वह ठीक से बोल भी नही पा रही थी। कई दिनों बाद महिला के परिवार ढूढ़ते हुए अस्पताल पहुंचा। लेकिन इस दौरान जगदीश उस महिला की दवा और खाना आदि का ख्याल रखते थे। जगदीश कहते हैं कि सात साल पहले उनके साथ भी ऐसी ही घटना हो गई थी। तब दूसरों ने मदद किया था। इसके चलते वह जीवित हैं। ऐसे लोगों का मदद करने से खुशी मिलती है।
अस्पताल प्रशासन भी जगदीश के व्यवहार से खुश हैं। इसलिए उन्हें डिस्चार्ज नही किया गया है। जगदीश वार्ड की साफ सफाई, बेडशीट आदि लगवा देते हैं। ब्लड बैंक और आई बैंक में सुबह शाम गेट खोलने और बल्ब जलाने और बुझाने की जिम्मेवारी उनपर है। सिविल सर्जन डाॅ श्रीनाथ प्रसाद के मुताबिक, किसी के रहने से किसी मरीज को लाभ पहुंच रहा है तो इस बात का ख्याल रखना पड़ता है। अस्पताल की संपति की सुरक्षा में भी मदद करते हैं। चिकित्सक डाॅ विमल प्रसाद कहते हैं कि अस्पताल की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं। कई दफा चोर उच्चकों से भी सामना हुआ है। फिर भी पूरा ख्याल रखते हैं। इस अवस्था में जबरन मुक्त किया जाना उचित नही है।

घरवाले नही जानते कि जगदीश गोप जीवित हैं
सात साल पहले जगदीश मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलने के लिए पैदल पटना जा रहे थे। लेकिन पटना से कुछ दूर पहले जेठुली के समीप मोटरसाइकिल सवार दो लोगों ने उन्हें धक्का मार दिया। उनका कागजात और झोला छीन लिया। जगदीश बेहोश होकर सड़क किनारे गिर गए थे। शरीर का एक भाग पूरी तरह दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। तब एक आॅटोवाला ने डाॅ बीएन प्रसाद के क्लिनीक में दाखिल करा दिया। चिकित्सक करीब दो सालों तक उनका मुफ्त में इलाज किया। जब वह चलने फिरने लायक हुए तब नवादा सदर अस्पताल में दाखिल हुए। तबसे सदर अस्पताल के बेड संख्या-20 उनका ठिकाना बना है। घरवालों को भी नही पता कि वह जीवित हैं। दरअसल, जगदीश का जमीन को लेकर एक दबंग व्यक्ति से विवाद है। इसलिए जगदीश गांव नही लौटना चाहते हैं। उन्हंे डर है कि गांव जाने पर उनकी हत्या कर दी जाएगी। जगदीश की पत्नी 25 साल पहले मौत हो गई है। दो बेटे उमेश और मुन्ना है। लेकिन वह भी गांव से बाहर रहता है। एक बेटी कुंती है, जो अपने ससुराल में रहती है।

जिनके दादा के नाम पर अमझरी गांव, वह पांच साल से अस्पताल के रहमो करम पर
जगदीश नवादा जिले के सिरदला के अमझरी गांव का रहनेवाला है। जगदीश के मुताबिक, उनके पूर्वज को टेकारी इस्टेट ने करीब 300 विगहा जमीन दिया था। वह बधार था। लेकिन उनके दादा झरी गोप ने आम का एक पेड़ लगाया था। तभी से अमझरी नाम पड़ गया। परिवार बढ़ गया। लेकिन आमदनी घट गई। लिहाजा, वे पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में राजमिस्त्री का काम करते थे। लेकिन 20 सालों बाद जब गांव लौटे तब उनके जमीन का नया सर्वे में दूसरे के नाम पर चढ़ा दिया। इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू किया तब उनका जान पर आमदा हो गए। लिहाजा, गांव छोड़कर ननिहाल चैबे बिहवलपुर में रह रहे थे। कोर्ट से जीत मिल गई। कब्जा के लिए मुख्यमंत्री से मिलने जा रहे थे तब उनपर जानलेवा हमला किया गया। अब वह अस्पताल के रहमोकरम पर है। जगदीश कहते हैं कि वह अपनी जमीन को सरकार को देना चाहता हूं ताकि
कोई बड़ा अस्पताल या कारखाना खोला जाय।