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शराबबंदी कानून की सजा भूगतेगी गंूगी महिला

अशोक प्रियदर्शी
‘पहले वह ठीक से रहती थी। जब वह जीवित था। अब ना रूम में जाती है। नही खाती है। बोलती नही है। बच्चा को भी गोद नही लेती। सिर्फ आंख से आंसू गिरता है।’ यह हाल है बिहार के रोहतास जिले के दनवार की 25 वर्षीय बंटी कुंवर की, जो बचपन से गूंगी है। उनकी पीड़ा को शब्दों में बयां की है उनकी सास ललमोहना देवी।
विगत 27 अक्टूबर को जहरीली शराब की एक घटना में बंटी के पति कमलेश सिंह की मौत हो गई है। लेकिन गूंगी हैं। इसलिए अपनी दर्द को शब्दों में बयां नही कर पा रही हैं। लेकिन उनके गतिविधियों में आए बदलाव शब्दों से अधिक गम के भाव प्रकट कर रहा है। हालांकि उन्हें ऐसा किसी ने नही बताया कि उनका पति मर गया है। लेकिन परिस्थिति देखकर खुद समझ गई हैं।
ललमोहना देवी बीबीसी से कहा-‘घर में लाश पड़ी देखी तो वह खुद समझ गई की कमलेश जीवित नही है। जीभ आगे निकालकर बताने लगी कि वह मर गया। घर नही आने से भी वह समझ रही है कि जीवित नही है। इसलिए वह अपने कमरे में भी नही जाती है।’
लालमोहना देवी के मुताबिक, कमलेश की मौत के बाद से वह उस कमरे में नही गई हैं, जिसमें वह कमलेश के साथ रहती थी। रात में अचानक भागने लगती है। लोग पकड़ते है। इशारे में समझाते हैं। उसके बाद वह शांत पड़ती है। आशंका रहती है कि कहीं घर से भाग नही जाए इसलिए उसे अकेले नही छोड़ती हैं। उसके साथ वह खुद सोती हैं।
मृतक कमलेश की भाभी रानी देवी कहती हैं कि छह माह पहले जब बच्चा हुआ था तब से वह काफी खुश रहा करती थी, उसे कपड़े का झूला बनाकर झुलाती रहती थी। लेकिन कमलेश की मौत के बाद से बच्चा से भी लगाव नही रख रही है। उसे बच्चे की भविष्य का वास्ता दिया जाता है तब वह उसे गोद में लेती है।
बंटी यूंही परेशान नही है। उसे जुबान नही है। इसलिए शब्दों में प्रकट नही कर पा रही। लेकिन कमलेश की कमी उसे हर पल सता रही है। माथे पर बिंदिया और हाथ में चुड़ी नही देखती है तब वह आंख मूंद लेती है। उसकी आंखों में आंसू डबडबा जाता है।
ललमोहना बताती हैं कि कमलेश जब जीवित था तब उसे वही खाना देती थी। स्नान करने के लिए कपड़ा देती थी। पानी देती थी। चापाकल चला देती थी। कपड़ा साफ कर देती थी। उसे सूखाती थी। फिर उसे लाकर रखती थी। लेकिन अब जब वह कमलेश को नही देखती है तब से चुपचाप रहती है। कंठ नही है, इसलिए अपनी बात को नही रख पा रही है। लेकिन वह सब समझती है।
घटना के दिन से वह खाना छोड़ दी है। बहुत दबाव के बाद एकाध रोटी खा लेती है। चाय भी नही पीती। कोई दुख दर्द प्रकट करने आता है। उससे वह शब्दों में अपनी पीड़ा को साझा नही कर पाती। लेकिन उसका गुमशुम चेहरा शब्दों से ज्यादा दर्द बयां कर रही है।

बंटी के मायके वाले भी परेषान
बंटी का मायका भी रोहतास जिला के गोराड़ी प्रखंड के करमा गांव है। बंटी के पिता अजय सिंह किसान हैं। उनके तीन संतानों में बंटी बड़ी है। वह गूंगी थी इसलिए बड़ी मुश्किल से शादी तय हुई। बंटी के भाई राहुल ने बीबीसी से कहा-‘ बहन बेजुवान थी, मेरे पिताजी को काफी ढूढ़ने के बाद 2015 में कमलेश सिंह से शादी हुई थी। शादी के बाद दोनों परिवार खुश थे। लेकिन इस घटना के बाद दोनों परिवार की चिंता बढ़ गई है।’ राहुल बताते हैं कि पहले जब बंटी से मिलने जाते थे तब खुद खाना लाकर देती थी। खुश रहा करती थी। लेकिन अब एक जगह पर गुमषुम बैठी रहती हैं। आंख डबडबाए रहता है। बच्चा से भी चिड़चिड़ापन रहता है।
दरअसल, बंटी के समक्ष ऐसी परिस्थिति जहरीली शराब के कारण उत्पन्न हुई है। जब बिहार में पहली अप्रैल 2016 से पूर्ण शराबबंदी कानून लागू है। लेकिन जहरीली शराब के कारण दनवार गांव में कमलेश सिंह (30 वर्ष), उदय सिंह (37 वर्ष), धनजी सिंह (30 वर्ष) और हरिहर सिंह (55 वर्ष) की मौत हो गई। चार की हालत बिगड़ गई थी। मृतकों में एक बंटी के पति कमलेश भी शामिल था। कमलेश पैर से विकलांग था। लेकिन कमलेश और बंटी का दांपत्य जीवन सुखमय था।
हालांकि बंटी को शराबबंदी कानून की जानकारी नही थी। लेकिन शराब के नुकसान की जानकारी बखूबी थी। इसलिए कमलेश जब कभी शराब पीकर आता था तब वह इशारे में इसका प्रतिकार भी करती थी। बंटी के भाई राहुल ने कहा कि उनकी बहन उनके बहनोई को हाथ से इशारा कर बताती थी कि शराब पीने से शरीर खराब हो जाएगा।
मुश्किल कि इस नए शराबबंदी कानून में बंटी जैसी पीड़िता को मदद के लिए कानून में कोई प्रावधान नही है। रोहतास के जिलाधिकारी अनिमेष कुमार पराषर ने बीबीसी से कहा-‘ अंडर एक्ट प्रोविजन नही है, जो लोग हैं वो वायलेटर हैं। लेकिन जो फैमिली है वह विक्टिम है। अर्निंग मेंबर चला गया। निश्चित रूप से दूसरे स्तर से मदद का प्रयास किया जाएगा। अंडर एक्ट के तहत कोई प्रावधान नही है।’
मृतक कमलेश के बड़े भाई अरविंद सिंह ने बीबीसी से कहा- ‘सरकार को कानून बनाने से पहले सोचना चाहिए कि क्या कानून बना रहे हैं। गरीब-गुरबा, जो जुबान से नही बोलती है, उसपर क्या असर पड़ेगा। पहले मुआवजा का प्रावधान था लेकिन अब वह भी बंद है। दारू कागज में बंद है लेकिन हर जगह उपलब्ध है। सरकार को सोचना चाहिए कि ऐसे आदमी पर क्या असर पड़ेगा।’
मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की प्रदेश अध्यक्ष प्रो डेजी नारायण ने बीबीसी से कहा-‘मुआवजा नही देना एक अमानवीय व्यवहार होगा क्योंकि एक तो वह दोषी है नही, निःशक्त भी है। बोल नही सकती है। गूंगी है। उसे हर तरह का सहयोग मिलना ही चाहिए। ’
प्रो डेजी नारायण के मुताबिक, ‘पीयूसीएल का स्टैंड था कि देसी शराब से ज्यादा मौते होती है। बैन हो तो पूरी तरह बैन हो। जहां तक सीजर का सवाल है उसका शुरू से विरोध रहा है। पति पी रहा है। या कोई और शराब लेकर आ रहा है तो पूरे परिवार को गिरफ्तार किया जाएगा। वह सब खत्म हुआ। लेकिन जहां तक मुआवजा का सवाल है वह बिल्कुल महिलाओं को मिलना चाहिए। क्योंकि निर्दोष को फंसा देना और उसे सजा देना उचित नही है।’
हालांकि पटना एएन सिन्हा इंस्ट्रीच्यूट के प्रो एके झा ने बीबीसी से कहा-‘ये तो सामाजिक व्यवस्था को देखना होगा। ऐसा नही कि एक गूंगी महिला के साथ ऐसी घटना हुई तो पूरा का पूरा कानून गलत हो गया। समाज की भी जिम्मेवारी बनती है तो बाकी लोग उसके सपोर्ट में खड़े हों।’
सीपीआई (माले) के राज्य सचिव कुणाल ने बीबीसी से कहा-‘हम सरकार से मांग करते हैं कि उनका भरण पोषण की व्यवस्था हो, उसका जीवन आगे कैसे चलेगा सरकार इसपर ध्यान दे और जो काले प्रावधान है उसे सरकार निष्चित रूप से वापस ले। ’
देखंे तो, समाज में शांति और परिवार में खुशहाली के लिए बिहार में शराबबंदी कानून लागू की गई है। लेकिन बंटी जैसे लोगांे की पीड़ा कानून की सफलता पर सवाल खड़ा करती हैं।