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शहीदों के वंशज को समाज में सम्मान के लिए अनूठा पहल

डाॅ. अशोक प्रियदर्शी
पटना सचिवालय के समीप सात शहीदों की आदमकद मूर्तियां है। मूर्तियां देखते ही उनकी कुर्बानियां याद आती है। लेकिन गुजरते ही लोग भूल जाते। ज्यादातर बच्चे इनके बारे में नही जानते। नही उनके माता पिता इनके बारे में बता पाते हैं। यह स्थिति तब है जब देश की आजादी के अभी सात दशक ही हुए हैं। इन शहीदों के वंशज कौन हैं। किस हाल में हैं। ज्यादातर लोग अंजान हैं। ताज्जुब कि उन सात नौजवान शहीदों के वंशज आज भी जीवित हैं। कोई साइकिल का पंचर बना रहे हैं। कोई मजदूरी। हालांकि 9 अगस्त को उनकी प्रतिमाओं पर माला चढ़ाए जाते हैं, पर उनके वंशजों के हाल से अंजान हैं।
बिहार के दरभंगा जिले के उजान गांव निवासी शिवनाथ झा ऐसे ही अमर शहीदों के वंशजों को ढूढने का काम कर रहे हैं। उन्होंने उमाकांत प्रसाद सिंह, रामनंदन सिंह, सतीश प्रसाद झा, जगपति कुमार, राजेन्द्र कुमार, रामगोपाल सिंह के वंशजों की खोज कर चुके हैं। बाबू वीर कुंवर सिंह और उनके सेनापति जयपाल सिंह के वंशजों को भी ढूढ़ने में कामयाब रहे हैं। दायरा बिहार तक सीमित नही है। विगत 11 सालों में 70 शहीदांे के वंशजों को ढूढ़ चुके हैं। रानी झांसी, वाजिद अली साह, मंगल पांडे, जबरदस्त खां, बहादुर शाह जफर, दुर्गा सिंह, सुरेन्द्र साई, उधम सिंह, खुदीराम बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राज गुरू, राम प्रसाद बिस्मिल, बटुकेश्वर दत जैसे नाम शामिल हैं। आजादी के 70वें साल मेंएक पुस्तक भंेट करना चाह रहे हैं, जिसमें 70 शहीदों की कुर्बानियां और उनके वंशजों की कहानियां होगी। वे ढाई घंटे से अधिक का एक डाकूमेंट्री बनाना चाहते हैं ताकि देशवासी यह महसूस करें कि आजादी हमें कैसे मिली थी।

शहीदों के वंशजों को पहुंचा रहे मदद
शिवनाथ झा किताबों के जरिए अमर शहीदों के वंशजों को मदद पहुुंचाने का काम कर रहे हैं। इस अभियान का नाम दिया है-आंदोलन एक पुस्तक से। अबतक छः किताबों के जरिए छः गुमनाम क्रान्तिकारियों, शहीदों के वंशजों को नया जीवन देने की कोशिश किया है। तात्या टोपे की पीढ़ी विनायक राव टोपे की दो बेटियों को रेलवे में नौकरी और पांच लाख रूपये की आर्थिक मदद दिलाने में कामयाब रहे। यही नहीं, बहादुर शाह जफर के वंशज एक झोपडी में रहती हैं। उन्हें किताब के जरिए दो लाख रूपए का बंदोवस्त किया। सुल्ताना बेगम की नतनी को तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने नौकरी दी।
उधम सिंह के वंशज जीत सिंह जो सोनाम (पंजाब) में देहारी का काम करते थे, उन्हें किताब के जरिए १२ लाख रुपये का बंदोवस्त किया गया। एक और किताब से पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के वंशज बीरेंद्र सिंह की बेटी प्रियंका की शादी कराया। सुलभ के संस्थापक प्रियंका को २ लाख रुपये दिए। एक विधवा के वंशज को मदद पहुंचाई गई। शिवनाथ चार और किताब . इंडिया एट 70, 1857-1947 मार्टियर्स ब्लडलाईन्स, बनारस फ्रॉम टाईम इमेमोरिअल और लखनऊ दी गोल्डन सिटी ऑफ द ईस्ट किताबों से चार अन्य वंशजों को नया जीवन देने को संकल्पित हैं। इनमें पटना सचिवालय के सामने शहीद हुए नौजवानों के वंशज शामिल हैं।
शिवनाथ मानते हैं कि उनकी किताब को कई प्रकाशक प्रकाशित करने को तैयार हैं। लेकिन इससे शहीदों के वंशजों को लाभ नही मिल सकेगा। इसलिए किताब के प्रकाशन के लिए लोगों से मदद ली जाती है। उस राशि से किताब प्रकाशित होने के बाद बची राशि को शहीदों के वंशज को दे दिया जाता है। वह कहते हैं कि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में बिहार की भूमिका अक्षुण है। सिर्फ बिहार के २००० लोग ही साथ आएं तो शहीदों की शाहदत और उनके वंशजों को नया जीवन देने पर एक नया इतिहास लिखा जा सकेगा। शिवनाथ अपने जीवनकाल में कम से कम २० ऐसे वंशजो को किताबों से नया जीवन देने का प्रण लिया है। वह कहते हैं कि किताब कभी मरती नही। इसलिए हमारा प्रयास-आन्दोलन: एक पुस्तक से।

कैसे शुरू किया अभियान
शिवनाथ के मुताबिक, 2002 में टीवी पर भारत रत्न शहनाई उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहेब का इंटरव्यू देखा था। खान साहेब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और भारत सरकार से मदद की गुजारिश किये थे। तब बनारस के तत्कालीन सांसद मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में कुछ मदद किया गया था। उन्होंने तभी बिस्मिल्लाह खान को आर्थिक मदद करने के लिए एक किताब बनाने का तय किया। 2006 में मोनोग्राफ ऑन उस्ताद बिस्मिल्लाह खान तैयार हो गया। तीन किलो चांदी की शहनाई उन्हें भेट की गई। सुलभ के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक ने आर्थिक मदद किया।
तब खान साहेब ने शिवनाथ की पत्नी नीना झा से कहा था कि तुम दरभंगा की बहु हो, मेरी एक ख्वाइस पूरा कर दो। मैं मरने से पहले इंडिया गेट पर शहीदों को शहनाई से आमंत्रित कर फिर उन्हें शहनाई से विसर्जित करना चाहता हूँ। राजा बहादुर दरभंगा की शादी में मुझे एक स्वर्ण का असर्फी मिला था, वह तुम्हे सौंप दूंगा। तिथि भी निर्धारित हो गई। लेकिन खान साहब की तबियत खराब हो गई। 21 अगस्त 2006 को उनकी मौत हो गई। तभी से शहीदों और उनके जीवित वंशजों की तलाश का काम जेहन में आया।

कौन हैं शिवनाथ
शिवनाथ के पिता गोपाल दत्त पटना स्थित नोवेल्टी एंड कंपनी में मामूली नौकरी करते थे। आर्थिक हालत दयनीय थी। लिहाजा, शिवनाथ बचपन में अखबार बेचकर पिताजी के काम में हाथ बटांते थे। संघषपूर्ण स्थिति में भी उन्होंने पढ़ाई पूरी की। पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र विषय में स्नातकोत्तर किया। वे जीवन के 58 वर्षों में 43 वर्ष पत्र और पत्रकारिता में गुजारे हैं। कई सालों से दिल्ली में हैं। फिलहाल, ऑस्ट्रेलिया से उद्घोषित स्पेशल ब्रॉडकास्टिंग सर्विस रेडियो का भारत से प्रतिनिधित्व करते हैं। इस अभियान में उनकी पत्नी नीना झा और पुत्र आकाश भी बराबर के भागीदार हैं।