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उम्र को दी मात

अशोक प्रियदर्शी
‘सबसे पहले लिटरेचर को हिंदी से इंग्लिश में ट्रांसलेट किया। रिविजन किया। फिर डिटेल में प्रश्न वाइज नोट्स बनाए। सब नोट्स बन गए तो उसका शाॅर्ट नोट्स बनाया। इम्तिहान में एक दिन पहले बहुत तो नही पढ़ सकते। तब शाॅर्ट नोट्रस बनाया। आखिरी में एक पर्चे पर सिर्फ प्वाइंट बनाकर रखे, कार में भी पढ़ते थे, जितना प्रस्तुत किया जितना कर सके।’
ये कहना है बिहार की राजधानी पटना के राजेन्द्र नगर निवासी 98 वर्षीय बुजुर्ग राजकुमार वैश्य का, जिन्होंने पिछले साल 25 सितंबर को नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी से एकोनोमिक्स में द्वितीय श्रेणी से पीजी पास किया है।  वैश्य कहते हैं कि- रिवाइज करते थे। परेशान नही होते थे। क्योंकि पास होकर कोई नौकरी तो करनी नही थी। पास कर गए तब भी ठीक, फेल हो गए तब भी ठीक।’
वैश्य की कहानी उन बुजुर्गों के लिए प्रेरणास्त्रोत है, जो 60 पार करते ही खुद को लाचार समझने लगते हैं। वरिष्ठ पत्रकार कुमार अनिल ने कहा कि बुजुर्गों के लिए संदेश है कि आपका शरीर भले कमजोर होता जाता है लेकिन मानसिक तौर पर मजबूत हैं तो शरीर भी आपका दृढ़ रहेगा।’

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