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किसान आंदोलन का तीर्थस्थल है रेवरा

डाॅ.अशोक प्रियदर्शी
           स्वामी सहजानंद सरस्वती किसान आंदोलन के अगुआ रहे हैं। उनके नेतृत्व में कई आंदोलन हुए। लेकिन बिहार के रेवरा आंदोलन के बिना स्वामी सहजानंद सरस्वती के आंदोलन की कहानी पूरी नही होती। बिहार के नवादा जिले के काशीचक प्रखंड के रेवरा आंदोलन बाकी आंदोलनों से अलग थी। बाकी आंदोलनों में किसान नेताओं ने आंदोलन का नेतृत्व किया था। लेकिन रेवरा में स्वामी सहजानंद सरस्वती समेत कई किसान नेता पीछे होते थे। किसान खुद नेतृत्व करते थे। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने भी इस बात का जिक्र किया है। रेवरा के किसान खुद आंदोलन किया था। इस आंदोलन में देशभर के किसान जुटे थे। यही नहीं, आंदोलन में पहुंचने वाले किसान खुद अपना खाना लाते थे। साथ मिलकर बनाते थे।
         रेवरा के किसानों की हालत ऐसी हो गई थी कि वे लोग पाकर का पता खाकर भूख मिटाते थे। किसान आंदोलन व्यापक स्वरूप ले लिया। सबसे खास कि रेवरा आंदोलन में महिलाएं भी सक्रिय भूमिका निभाइ्र थी। ब्रिट्रिश सिपाही और जमींदार के कारिंदे का जूल्म इतना बढ़ गया था कि ज्यादातर पुरूष गांव छोड़कर भाग गए थे। किसानों को हल जोतने पर भी पाबंदी लगा दी गई थी। तब महिलाएं हल जोतने लगी थी। जमींदार के कारिंदे और ब्रिट्रिश फौज हल खुलवाने के लिए पहुंचते थे। लेकिन महिलाएं उसे घेर लेती थी। आखिर में उसे भागना पड़ता था।
     दरअसल, जमींदार और उनके कारिंदे के अत्याचार से रेवरा के ग्रामीण त्रस्त थे। स्वामी सहजानन्द ने ‘अपनी जीवन संघर्ष’ और ‘किसान कैसे लड़ते हैं’ नामक पुस्तक में जमींदारों के अत्याचार की कहानियों का जिक्र किया है। उसमंे रेवरा के आंदोलन की भी चर्चा है। गांव के करीब 1500 विगहा जमीन को साम्बे के स्थानीय जमींदार रामेश्वर प्रसाद सिंह बगैरह ने नीलाम करवा ली थी। लिहाजा, गांव के पांच छः सौ व्यक्ति चिथरा पहने भूखो मरते थे। जमींदार मनमाना लगान वसूल रहे थे। इसके चलते किसानांे की जमीन नीलाम हो गई थी। किताब में जिक्र है कि एक बार जमींदार के कारिंदे ने गांव से दूध मंगवाया था। गांव में दूध नही रहने पर कहा था कि औरत को दूह लाओ। अत्याचार की ऐसी कई कहानियां रही है।
    जमींदारों के जुल्मांे सितम से परेशान रेवरावासी जमींदार, मजिस्ट्रेट, मंत्रियों और लीडरो के पास दौड़ लगाते थक गए थे। किसी ने मदद नही की। तब किसानों ने स्वामी जी के सहयोगी पंडित यदुनन्दन शर्मा का हाथ पकड़ा। उसके बाद स्वामीजी का साथ मिला। फिर आंदोलन व्यापक आकार ले लिया था। इसमें राहुल सांकृतायन, ब्रह्मचारी बेनीपुरी ने किसानों का पूरा साथ दिया था। आखिर में तत्कालीन कलक्टर हिटेकर को समझौता करना पड़ा था। जमींदार को करीब डेढ़ सौ विगहा जमीन छोड़कर बाकी जमीन किसानों और मजदूरों में बांट दी गई थी। किसानों के सत्याग्रह के कारण रेवरा देश के अन्य किसानों का प्रमुख तीर्थ बन गया था। लोग इस आंदोलन की चर्चा करते थे।
इस आंदोलन की सफलता की सबसे बड़ी वजह यह है कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी ग्रामीणों ने संयम नही खोया था। 80 वर्षीय बुजुर्ग
बच्चू नारायण शर्मा कहते हैं कि जमींदार के अत्याचार के कारण रेवरा के ग्रामीणों के समक्ष भूखों मरने की नौबत थी। आधे ग्रामीण जीविका के लिए पलायन कर गए थे। बाकी बचे लोग बैलगाड़ी चलाकर गुजारा करते थे। उसी दौर में उनका जन्म हुआ था। लेकिन होश संभालने के बाद जमींदारों का अत्याचार खत्म हो चुका था। उनके पूर्वज बताया करते थे कि छप्पड़ पर दो कददू फलता था उसमें एक कददू जमींदार का, दो बकरे में एक जमींदार का हो जाता था।
           ईख की खेती होती थी। कोलसार में ईख की पेराई होती थी। लेकिन जमींदार के कारिंदे रातभर उसकी निगरानी करते थे। ऐसी कई प्रतिकूल परिस्थितियां थी। ताज्जुब कि अत्याचार के उस दौर में ग्रामीणों ने संयम नही खोया। कोई चोर और डाकू नही बना। संघर्ष का रास्ता अख्तियार किया। यही वजह है कि जमींदार के अत्याचार से मुक्ति मिली और रेवरा एक मिसाल बना।
       यही नहीं, रेवरा आंदोलन की खासबात कि कोई किसान मजदूर भूमिहीन नही बचा था। जमींदारों से जब समझौता हुआ तब सभी किसानों और मजदूरों के बीच जमीन का वितरण किया गया। 100 वर्षीय काशी पंडित कहते हैं कि वह मजदूर परिवार से हैं। उनके परिवार में करीब एक एकड़ जमीन है। वह रेवरा आंदोलन के समय स्वामी सहजानंद सरस्वती के अनुयायी थे। वह जूल्मी जमींदार के खिलाफ गीत गाते थे। झंडा लेकर स्वामीजी के साथ घुमते थे। इस आंदोलन की खासियत कि मजदूर और किसान सभी भागीदार थे।
          खेतों के बंटवारे में भी किसान और मजदूरों की भागीदारी रही। काशी पंडित के मुताबिक, रामधन सिंह और लखपत सिंह परिवार में सवा-सवा सौ विगहा जमीन थी। लेकिन उन परिवारों ने करीब 50-50 विगहा जमीन किसान और मजदूरों को दे दिय था। करीब 300 विगहा जमीन किसान और मजदूरों को बांटा गया था। रेवरा का कोई भी किसान और मजदूर भूमिहीन नही था। रेवरा सत्याग्रह सामाजिक न्याय का भी अनूठा उदाहरण रहा है।
        रेवरा आंदोलन की सफलता में किसानों की एकजुटता रंग लाई थी। 90 वर्षीय रामचंद्र सिंह कहते हैं कि किसानों की एकजुटता का नतीजा रहा कि 1938-39 के आठ माह के किसान आंदोलन के आगे जमींदार को झुकना पड़ा था। स्वामीजी की अगुआई में रेवरा में सत्याग्रह हुआ था। देशभर से करीब 25 हजार किसान जुटे थे। आखिर में ब्रिट्रिश अधिकारियों और जमींदार के कारिंदे पीछे लौटने पर मजबूर हो गए थे। रेवरा को किसानो का तीर्थस्थल माना जाता है। महाशिवरात्रि के दिन स्वामी सहजानंद सरस्वती की पूजा की जाती है।

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