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यावां-नावां वाले गांव से क्यों है बौद्ध साहित्य का संबंध , पढ़िए रोचक स्टोरी

Exclusive post/Ashok Priyadarshi

घोसतावां गांव देवी स्थान के समीप बुद्ध की मूर्ति है। यह ध्यान मुद्रा की है। एक मूर्ति अभय मुद्रा की है, जिसमें छतरी लगी है। बु़द्ध की ऐसी कई खंडित मूर्तियां है। ग्रामीणों के मुताबिक, बड़ी तादाद में ऐसी मूर्तियां थी लेकिन देखरेख के अभाव में सोलिंग के अंदर दब गई। ग्रामीण राजीव नयन बताते हैं कि घोसतावां आहर पर भी ऐसी कई मूर्तियां थी लेकिन खुदाई के दौरान मिटटी से दब गई है। बाकी मूर्तियां भी नष्ट हो रही है। बिहार के नवादा जिले के सदर प्रखंड के घोसतावां में ऐसी मूर्तियों का मिलना कोई नई बात नही है। लेकिन यावां और नामा जुड़े गांवों में मूर्तियों के मिलने की बात बौद्ध साहित्य के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है।

नव नालंदा महाविहार के पालि विभाग के प्रोफेसर डाॅ विश्वजीत कुमार कहते हैं कि जीपी मलाला सेकरा की डिक्शनरी आॅफ पालि परोपर नेम और प्रो सीएस उपासक की बुद्धिस्ट मोनास्टिक डिक्शनरी में पठन पाठन के बड़े केन्द्र को विहार और महाविहार कहा जाता था। जबकि जहां लोग निवास करते थे उसे अराम कहते थे। बोलचाल में अराम ही नामा और यावां बोला जाने लगा, जिसे गांवों से जोड़कर प्रतिष्ठित किया जाने लगा। वर्षावास के दौरान बौद्ध भिक्षु घनी आबादी के बाहर वास किया करते थे।

घोसतावां अकेला ऐतिहासिक गांव नही
नवादा का घोसतावां अकेला बौद्ध इतिहास के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण नही है। नालंदा के घोसरावां में भी बौद्ध से जुड़ी मूर्तियां मौजूद है। अबभी इसकी पूजा अर्चना की जाती है। देखें तो, नवादा के डुमरावां, महरावां, पकरीबरावां, पचगावां, धनियावां, विरनावां जैसे दर्जनों ऐसे गांव हैं जिनके नाम के पीछे यावां और यामा हैं। ऐसे अधिकतर गांवों में बुद्ध के अवशेष मौजूद हैं।

रिसर्च स्काॅलर निगम भारद्वाज कहते हैं कि भगवान बुद्ध मूर्ति पूजा के पक्षधर नही थे। लेकिन कालांतर में उनके उपासक ने उनकी मूर्ति और मोनास्ट्री बनाकर पूजा करने लगे हैं। हालांकि कई गांवों में बुद्ध की मूर्तियों को हिन्दू देवी देवताआंे के रूप में पूजा की जा रही है। मंजूश्री को कार्तिकेय, जांभल को कुबेर, तारा को दूर्गा, अवलोकितेश्वर को विष्णु के रूप में पूजा की जा रही है।

मगध में दर्जनों गांव हैं जहां मिलते हैं बौद्ध साहित्य के अवशेष
नालंदा के उगावां, तेतरावां, सिरनावां, मणियावां, सकरावां, करियावां, मुरगावां, धनावां, परनावां, अस्थावां, ओकनामा, उपरावां, सिगरावां, कोसियावां, ओरियावां,दनियावां, सोनियावां, मछरावां, अलावां, जहानाबाद के कसियावां, शेखपुरा जिले का हथियावां जैसे कई गांव हैं जहां कोई न कोई रूप में बौद्ध साहित्य के अवशेष मिलते हंै।

दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्काॅलर और समाजसेवी शिशु रंजन कुमार मानते हैं कि यावां और यामा वाले गांवों का संबंध बौद्ध साहित्य से जुड़ा है। शिशु रंजन बताते हैं कि वे पटना, नालंदा, नवादा, शेखपुरा, जहानाबाद जिले के दर्जनों गांवों का दौरा किया, जिस दौरान ऐसे गांवों में कोई न कोई बुद्ध साहित्य से जुड़े अवशेष दिखें हैं। शिशुरंजन मानते हैं कि बिहार में ओदंतपुरी, तेल्हाड़ा, नालंदा, विक्रमशिला जैसे महाविहार रहे। महाविहारों में बड़ी तादाद में छात्र और शिक्षक होते थे, जिनके जीवन यापन के लिए भीक्षावृति की परंपरा रही है। भिक्षु जिन गांवों में ठहरते थे, उनके निवास स्थल ही अपभ्रंश रूप से यावां और यामा कहलाया जाने लगे।

पटना काॅमर्स काॅलेज के इतिहास विभाग के प्रोफेसर डाॅ राजीव रंजन कहते हैं कि नालंदा यूनिवर्सिटी के 200 ऐसे गांवों की खोज की जा रही है। संभव है यावां से जुड़े गांव भी उन 200 गांवांे का हिस्सा रहा हो।

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