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रेवरा की महिलाओं की सामाजिक चेतना: एक ऐतिहासिक अध्ययन 

डाॅ प्रमांशी जयदेव, 
असिस्टेंट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, गंगा देवी महिला काॅलेज, पटना।
           बिहार के नवादा जिले के काशीचक प्रखण्ड के रेवरा गांव में जमींदारों के अत्याचार की कहानी किसान आंदोलन का मील का पत्थर साबित हुआ था। इसआंदोलन में महिला चेतना की कहानी साहस भरी रही है। स्थानीय जमींदार के अत्याचार से मुक्ति के लिए स्वामी सहजानंद सरस्वती ने रेवरा के पीड़ित किसानों का नेतृत्व प्रदान किया था। खास बात कि उस आंदोलन में जब पुरूष का साहस कमजोर पड़ने लगा था तब महिलाओं ने जमींदारों के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठायीं थी। लाठियां चलाई थी। महिलाएं तबतक आंदोलनरत रही जब तक गांव जमींदारों के अत्याचार से मुक्त नही हुई थी। इसका श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को दिया जाता हैं, जिन्होंने किसान आंदोलन को अगुआई प्रदान किया था।
      स्वामी सहजानन्द ने ‘अपनी जीवन संघर्ष’ नामक पुस्तक में जमींदारों के अत्याचार की कहानियों का जिक्र किया है। उल्लेख है कि किसानों के छप्पर पर जब दो कददू फलते थे, तो उनमें से एक कददू जमींदार का हो जाता था। दो बकरे में एक जमींदार का होता था। गांव के करीब डेढ़ हजार विगहा जमीन को साम्बे के स्थानीय जमींदार रामेश्वर प्रसाद सिंह बगैरह ने निलाम करवा ली थी। लिहाजा, गांव के 500-600 व्यक्ति चिथरा पहने भूखो मरते थे। लड़कियां बेचीं जा रही थी। हद कि जमींदार उससे भी आधे मूल्य जमींदारी और बकाए लगान में वसूल रहे थे। जमींदारों के शोषण के कारण किसानांे की जमीन नहीं बच पाई। 
      अत्याचार और जुल्म सितम का आलम यह था कि-एक बार गांव वालांे से दूध की मांग की गई थी। जब जमींदार के कारिंदे ने कहा कि गांव में दूघ नही है तब जमींदार ने औरतों को दूह लाने का निर्देश दिया था। जैसा कि स्वामी सहजानंद ने स्वयं अपने जीवन संघर्ष में जिक्र किया है। जमींदारों के जुल्मांे सितम से परेशान रेवरावासी जमींदार, मजिस्ट्रेट, मंत्रियों और लीडरो के पास दौड़ लगाते थक गए थे। लेकिन किसी ने मदद नही की। किसानों ने पंडित यदुनन्दन शर्मा का हाथ पकड़ा। शर्मा ने किसानों को खेत जोत लेने और फसल काट लेने को कहा। शर्मा के इस बात पर किसान क्रोधित हो गए और स्पष्ट शब्दों में उन्हेें कहा था कि- ‘हमे लेक्चर नहीं नेतृत्व चाहिए।’ लिहाजा, शर्मा ने किसानों के लिए जमींदार के खिलाफ आंदोलन का निर्णय लिया। 
      लेकिन यह पहला अवसर था जब शर्मा ने स्वामीजी के अनुमति के बगैर आंदोलन का निर्णय लिया था। पर शर्मा का यह प्रस्ताव स्वामी जी को अच्छा लगा। लिहाजा, स्वामीजी के अलावा राहुल सांकृतायन, ब्रह्मचारी बेनीपुरी ने किसानों का पूरा साथ दिया था। सहजानंद किसानो को कहा करते थे कि किसान जब शक्ति बर्धक अन्न, मीठा गन्ना, उर्जा पैदा करने वाला फल-फूल पैदा कर सकता है तो वह किसान अपनों के बीच से नेता भी पैदा कर सकता है। इसका काफी असर रहा। रेवरा की महिलाओं ने यहां तक कह दिया था कि पुरूष हाथ उठा भी ले तो वे लोग पीछे नहीं हटेगंी। 
      जमींदार के कारिंदे और पुलिस किसानों को हल जोतने पर प्रतिबन्ध लगा रखा था लेकिन आन्दोलन इतना उग्र हो चुका था कि हल खुलवाने के लिए आने वाले पुलिसकर्मियों में कई लोग एक साथ लिपट जाते थे। पुलिस जब महिलाओं के साथ ज्यादती पर उतर गई तो महिलाएं पीछे नहीं हटीं और लाठियां उठा लीं थी। लिहाजा, जमींदार को समझौता के लिए राजी होना पड़ा। तत्कालीन कलक्टर हिटेकर ने पंडित यदुनंदन शर्मा से समझौता का प्रस्ताव भेजा। इसके तहत 150 विगहा जमींदार को छोड़कर बाकी जमीन किसानों के बीच वितरित कर दी गई। 
      किसानों के उग्र आंदोलन के कारण रेवरा देश के अन्य किसानों का प्रमुख तीर्थ बना था। यहां से प्रेरणा लेकर किसान आंदोलन को गति मिल सकी थी। वैसे तो महाशिवरात्रि का दिन शिव पार्वती के विवाह के दिन में मनाते हैं, लेकिन रेवरावासी इससे इतर जमींदारों से मुक्ति दिवस के रूप में मनाते हैं। ग्रामीण मानते हैं कि स्वामी जी का जन्म नही होता तो जमींदारों के अत्याचार से गांव के कई पीढ़ियों के लोग सजा भुगतते रहते।

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