logo

मुरझाए चेहरे पर वसंत ला रही बसंती

जिले के सुदूर प्रखण्ड सिरदला के मुरली गांव की रहने वाली बसंती देवी की शादी 13 वर्ष में हो गई। गरीब दलित परिवार में जन्मी बसंती को पढ़ने की काफी इच्छा थी,लेकिन परिवार की माली हालत ठीक नहीं रहने के कारण वह पढ़ाई नहीं कर सकी। कारण कि बसंती के सिर से पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। वह अपने 3 भाईयों एवं दो बहनों में तीसरे नम्बर पर थी। पिता की मौत के बाद पूरे परिवार की भरण पोषण का जिम्मा मां के उपर आ गया था।

– पढ़ाई की उम्र में हो गई शादी

बसंती बताती है कि 12 साल की उम्र में पढ़ाई करने की बहुत इच्छा हुई,लेकिन मां ने पढ़ाई के लिए स्कूल नहीं जाने दिया। 13 साल की उम्र में उसने झारखंड के चैपारण में शादी कर दी। बसंती दो भाईयों के बाद तीसरे नम्बर पर तो थी,लेकिन बड़े भाई मंद बुद्धि के थे। दोनों बड़ा भाई इस लायक नहीं था कि मां सहित अन्य भाई बहनों की परवरिश कर सके। इसी बीच शादी के कुछ महीने बाद ही बसंती की मां की मौत हो गई। मां की मौत के बाद बसंती भाईयों की देखरेख के लिए ससुराल छोड़कर मायके आ गई।

– 16 साल में हो गई पति की मौत,भाई ने भी घर से निकाला

बसंती ससुराल से आर्थिक सहयोग लेकर मायके में मनिहारी की दुकान खोल ली। वह दुकान चलाकर भाई-बहनों की परवरिश करने लगी। 16 साल की उम्र में पति का ऐक्सीडेंट में मौत हो गया। तब तक बसंती के भी तीन बच्चे हो चुके थे,जिसमें एक बेटा और दो बेटियां हुई। पति की मौत के बाद भाई ने भी उसे घर से निकाल दिया। बचपन से कष्टों में गुजारने वाली और अपने भाई-बहन की परवरिश के लिए सबकुछ छोड़ देने वाली बसंती के जीवन में अंधेरा छा गया। उसे 2 साल तक सड़क किनारे टेंट में गुजारना पड़ा,लेकिन वह हिम्मत नहीं हारी।

         – बसंती पीछे मुड़कर नहीं देखी

पति की मौत,भाईयों द्वारा घर से निकाले जाने के बाद बसंती पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। उसे जीवन यापन करने के लिए मजदूरी करने की नौबत आ गई। लेकिन वह मजदूरी नहीं करना चाहती थी। वह चाहती थी कि कहीं से कोई आर्थिक सहायता मिल जाए तो रोजगार करें। इसी बीच राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार के एक सामुदायिक बैठक में बसंती की मुलाकात जिला समन्वयक धर्मदेव पासवान से हुई। उनसे उन्होंने रोजगार के लिए सहायता की बात कही।

धर्मदेव पासवान कहते हैं कि माइक्रो फाइनेंस की मदद से उसे ऋण दिलाया गया। जिसे जुड़कर वह अपने गांव में ही श्रृंगार की दुकान खोल ली। अब वह न केवल बेहतमर जींदगी जी रही है। बल्कि अन्य महिलाओं को रोजगार के लिए प्रेरित कर रही है। बसंती देवी ने अबतक 120 महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ा है। उसकी प्रेरणा से गांव सहित आसपास के गावं की महिलाएं गाय पालन,बकरी पालन,सुअर पालन,श्रृंगार स्टोर,मेडिकल स्टोर आदि रोजगार से जुडी है। धर्मदेव पासवान कहते हैं कि बसंती देवी भले ही झंझावतें झेली है,लेकिन उसकी प्रेरणा से 120 महिलाओं की जिंदगी में वसंती है।

सम्बंधित खबर