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घरवाले परेशान नही हों, इसलिए शादी के बाद सामूहिक भोज की परंपरा

घोसतावां गांव निवासी पौरा पंचायत के पूर्व सरपंच नरेश प्रसाद की बेटी की शादी 28 अप्रैल को धूमधाम से की गई। ग्रामीणों ने बारातियों और रिश्तेदारों को अच्छे ढंग से स्वागत किया। लेकिन शादी के उस भोज में ग्रामीण नही सरीक हुए। तीन दिन पहले नरेश प्रसाद के बेटे के तिलक में भी ऐसा ही हुआ था।

ऐसा नही कि ग्रामीण नाराज थे। दरअसल, यह बिहार के नवादा जिले के सदर प्रखंड के घोसतावां गांव की एक अनूठी परंपरा का हिस्सा है। इसके चलते गांव में जब किसी के घर शादी होती है तब शादी के दिन ग्रामीण भोज में शामिल नही होते हैं। लेकिन शादी के बाद जब लोग फ्री हो जाते हैं तब ग्रामीण मिल बैठकर सहभोज का आयोजन करते हैं।

कुशवाहा समाज में चार दशक से चली आ रही ऐसी परंपरा
नरेश प्रसाद का मामला अकेला नही है। शादी के इस मौसम में घोसतावां गांव के सुनील महतो की बेटी, स्वर्गीय राजकुमार महतो का बेटा, दीनानाथ प्रसाद की बेटी, रामस्वरूप महतो के बेटे समेत दो दर्जन से अधिक शादियां हुई है। लेकिन इन शादियों ने ग्रामीणों ने बारातियों और रिश्तेदारों का स्वागत किया। लेकिन खुद सामूहिक भोज से अलग रहे।

वैसे तो, घोसतावां गांव की आबादी 2000 से अधिक है। लेकिन यह परंपरा कुशवाहा समाज में प्रचलित है। लोगों ने इसका नाम कुशवाहा समाज समिति रखा है। समिति के अध्यक्ष कुलदीप प्रसाद बताते हैं कि ऐसी परंपरा की शुरूआत यह ध्यान में रखते हुए किया गया है कि शादी के दिन घरवाले ज्यादा व्यस्त रहते हैं। ग्रामीणों और बारातियों की स्वागत ठीक से नही हो पाती थी। इसलिए समाज ने आपसी भोज शादियों के बाद करने का निर्णय लिया था।

शादियों के बाद समाज में सामूहिक भोज की परंपरा
अब जब शादी का लग्न खत्म हो गया है तब ग्रामीणों के बीच 20 दिनांे तक चली सामूहिक भोज की परंपरा। ग्रामीण विनोद कुमार बताते हैं कि शादियों से जब लोग फ्री हो जाते हैं तब समाज में सामूहिक भोज की परंपरा शुरू होती है। मुन्द्रिका प्रसाद बताते हैं कि शादी से फ्री होनेके बाद लोग समिति के समक्ष अपनी इच्छा जाहिर करते हैं, उसके बाद सामूहिक भोज आयोजित किया जाता है।

आश्चर्य कि घरवालों पर ज्यादा दायित्व नही होता। गया प्रसाद बताते हैं कि घरवाले सिर्फ सामग्री देते हैं, समाज ही भोजन तैयार कर लोगों को खिलाता है। समाज के पास अपना बर्तन आदि है। यही नहीं, खाना बनाने के लिए 12 सदस्यों की एक टीम है, जो रोटेशन के आधार पर काम करते हैं।

सामूहिक भोज का उदेश्य भाइचारगी और एकता
कुशवाहा समाज की एक कमिटी है। इसमें अध्यक्ष के अलावा शिवनंदन प्रसाद, राजेन्द्र महतो उपाध्यक्ष जबकि जयप्रकाश प्रसाद कोषाध्यक्ष हैं। इस कमिटी में इश्वरी प्रसाद, गोविंद कुशवाहा, शिवदयाल प्रसाद, सत्येन्द्र प्रसाद, सरयू प्रसाद, बालेश्वर महतो, सिद्धो महतो समेत कई सक्रिय सदस्य हैं।

समिति का मानना है कि सामूहिक भोज का मकसद भाइचारगी और एकता स्थापित करना है। इश्वरी प्रसाद बताते हैं कि लाचार लोगों को भोज के लिए कोई दबाव नही बनाया जाता है। बेटियों की शादी में जरूरतमंद लोगों को आर्थिक मदद पहुंचाई जाती है।

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